Thursday, June 6, 2019

Google Search, Assistant get special World Cup features

Keeping in line with the the ICC Cricket World Cup 2019 action, Google on Wednesday introduced special features to its Search, Assistant to help people get all the important match updates.

Users can now explore the tournament table, stats and upcoming matches right by just typing “ICC Cricket World Cup” on Search in languages including English, Hindi, Bengali, Marathi and Urdu, the company said in a statement.

For people who would not be able to watch the match Live, Google would show short video clips of match highlights and allow people to read through live commentary in English and Hindi.

To keep track of all the matches, users would be allowed to pin real-time scores on their Android phone screens from Search on mobile browsers or from the Android Google App, said the company.

In addition, Google Assistant would also help users keep up with the World Cup action by answering questions like “Hey Google, when does India play next?”

You can even get up-to-date stats by asking, “Hey Google, what are the current Cricket standings?” This also works in Google Search.

Source:- Technology News : Insight Online News

Saturday, May 25, 2019

मन तू जोत सरूप हैं अपना मूल पछान : चम्पा भाटिया

जब तक वर्ण कुल सब है तब तक ज्ञान उदय नहीं होता।

ब्रह्म ज्ञान पाकर सब वर्ण वर्जित (समाप्त, गौण) हैं।



निरंकार ने मनुष्य को विवेक दिया, सोचने समझने की बुद्धि दी, इसे जिज्ञासा हुई कि मैं कौन हूँ ? किसका अंश हूॅं? इस कठिन प्रश्न का हल सत्गुरु द्वारा प्राप्त हुआ।
मन तू जोत सरूप है, अपना मूल पछान।
तू शरीर नहीं इस परमात्मा का रूप है, इसकी पहचान करनी है। निराकार इन चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देता, सत्गुरु ने ज्ञान देकर इसके दर्शन कराए और समझा दिया कि इस प्रभु की भक्ति कैसे करनी है। हर ग्रंथ में भक्ति करने का यही एकमात्र मार्ग बताया है।
कामी क्रोधी लालची तिनसे भक्ति न होए।
भक्ति करे कोई सूरमा जात वर्ण कुल खोए।।
जाति वर्ण कुल ये सब साकार शरीर के साथ जुड़े हैं। लालच क्रोध कामनाएॅं इन सबका भाव समाप्त करके ही भक्ति हो सकती है। दूसरे प्रण में हुजूर माता जी ने बताया कि जाति वर्ण से ऊपर उठकर ही भक्ति का आनन्द प्राप्त कर सकेंगे।
पुरातन ग्रंथ शिव संहिता में 57वें श्लोक में भी यही लिखा हैः-
यावत् वर्णम् कुलम् सव्र्वम् तावत् ज्ञानम् न जायते।
ब्रह्मज्ञानम् पदम् ज्ञात्वा सव्र्व वर्ण विवर्जितः।।
इसमें स्पष्ट कर दिया कि हृदय में ज्ञान तभी बसता है जब जाति वर्ण का मान नहीं रहता। ज्ञान प्राप्त करके निरंकार से जुड़कर वह भी निरंकार ही हो जाता है। शिव संहिता के 30वें श्लोक में लिखा हैः-
निराकार मनो यस्य निराकार समो भवेत्।
जिस व्यक्ति का मन निराकार में है, वह निराकर के समान ही होता है।
तस्मात् सव्र्वप्रयत्नेन साकाराशु परित्यजेत्।
इसलिए सारे यत्नों से साकार (भाव) को त्याग देना चाहिए।
सत्गुरु ने दया करके इस विराट के दर्शन कराए तो जाना कि निरंकार के सिवाए और कुछ है ही नहीं। जो भी साकार रूप नजर आता है उसका अपना अस्तित्व कुछ है ही नहीं। निरंकार जब चाहे इस समाप्त कर दे। दिखाई देने वाली हर वस्तु ने मिट जाना है।
जिन्हें यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है वे सब में निरंकार रूप ही जानकर चरणों में नमस्कार करते हैं। आदि शंकराचार्य जी ने 526 ई0 में जो दोहा लिखा था, वह भी एक दूसरे के चरण स्पर्श की ओर प्रेरित करता है।
आकाशात् पतति तोयम् यथा गच्छति सागरम्।
जैसे आकाश से पानी गिरता है और सागर की ओर जाता है। बादल कहीं भी बरसें। पहाड़ों, नदियों, नालों या भूमि पर पहॅुंचना उसे सागर में ही है। इसी प्रकार
सर्व देह नमस्कारः तथा केशवम् गच्छति।।
वैसे ही सब देह को नमस्कार केशव (परमात्मा) को पहुॅंचती है। कहीं नहीं लिखा कि आयु विशेष या किसी जाति विशेष को की गई नमस्कार ही पहुॅंच सकती है।
भाग्यशाली है हम हमें ऐसा सत्गुरु मिला है। जिनका एक-एक बोल मंत्र है। इन्होंने उजाला देकर जो हमारी सोच बदल दी, हमें जीने की राह सिखाई रामचरित मानस में लिखा हैः-
उमा जे राम चरण रत विगत काम मद् क्रोध।
देखहिं प्रभुमय जगत कहिंसन करहिं विरोध।।
हे पार्वती। जो प्रभु राम के चरणों से जुड़ जाते है, उनका काम क्रोध, लालच सब समाप्त हो जाता है। सारा जगत ही प्रभुमय दिखता है, वैर किससे करें। सबमें तो निरंकार नजर आता है। श्री मद्भगवद्गीता में भी श्री कृष्ण ने जो संदेश दिया
यः माम् पश्यति सर्वत्र सर्वम् च मयि पश्यति।
तस्य अहम् न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।। 6-30
जो मुझे सब जगह देखता है वह सबमें मुझे देखता है। पहले ज्ञान प्राप्त करने की बात कही है कि जब सर्वत्र निराकार दिखाई देता है, फिर हृदय में यह भाव बनते है। सब में परमात्मा का रूप नजर आने लगता है। ऐसे में भक्त का भगवान से अटूट रिश्ता हो जाता है। श्री कृष्ण जो कह रहे हैं कि ऐसे भक्त से मैं दूर नहीं होता, वो भी मुझसे दूर नहीं होता।
सत्गुरु माता जी कृपा करें, यह जो दात बख्शी है। इसका एहसास हर पल बना रहे और सुखों के धाम में सदा रहें।
जिस दे दिल निरंकार दा वासा।
हर दम वसे सुख दे धाम।।
जिस दे दिल निरंकार दावासा अवतार करे लख लख प्रणाम।
Today Business News India Today
International News And Breaking News
Bihar Breaking & latest News in Hindi Today
Bihar News In Hindi Today
English News Headlines
Entertainment News India
Top Environment News
Latest Jharkhand News in Hindi

Wednesday, May 22, 2019

हड़िया : झारखण्ड का अनोखा सर्वमान्य मादक पेय




हड़िया : झारखण्ड का अनोखा सर्वमान्य मादक पेय
झारखण्ड के वन-प्रांतर में रहने वाले जनजातीय एवं मूलवासी परिवारों में एक पारम्परिक पेय पदार्थ हड़िया के सार्वजनिक रूप से सेवन का प्रचलन सर्वमान्य है। इस पेय पदार्थ में उर्जा और मादकता स्तर पर हड़िया को मद्य निषेध कानूनों के दायरे से मुक्त रखा गया है। वस्तुतः हड़िया घर-धर में बनाया जाता है।
इसका मूल घटक चावल है, जो आसानी से उपलब्ध है। हड़िया बनाने की विधि बहुत अधिक जटिल नहीं होने से इसे तैयार करने में परहेज नहीं किया जा रहा है। वस्तुतः सीधे शब्दों में कहा जाए तो हड़िया चावल के भात से बनता है।

Latest Jharkhand News in Hindi
Top News Portal on Ranchi
Jharkhand Online News Portal In Hindi
Latest Jharkhand News in Hindi
Latest Jharkhand News
Hindi News & Updates of Jharkhand
Jharkhand News in Hindi Today
Latest Jharkhand News in Hindi
Breaking News of Jharkhand
Jharkhand Business News in Hindi
jharkhand news ranchi
jharkhand news live today
Ranchi News
Latest Ranchi News
Jharkhand State News

Tuesday, April 9, 2019

कन्या भ्रूण हत्या पर कैसे लगेगी रोक

देशभर में नवरात्रि का व्रत चल रहा है। नवरात्रि को मातृ शक्ति के पर्व के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों तक मातृ शक्ति के रूप में सर्वत्र मां दुर्गा की पूजा की जाती है। इस दौरान कन्याओं की चरण वन्दना कर उनका पूजन, अभिनन्दन किया जाता है। उनको भोजन करवाकर उपहार दिये जाते हैं।



वैसे भी हम सालभर प्रत्येक शुभ कार्य में कन्या पूजन करते हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि उसी कन्या को हम जन्म से पहले या जन्म के बाद मारने का पाप क्यों करते हैं?

आज भी समाज में बेटियों को बोझ समझा जाता है। हमारे यहां आज भी बेटी पैदा होते ही उसके लालन-पालन से ज्यादा उसकी शादी की चिन्ता होने लगती है। आज महंगी होती शादियों के कारण हर बेटी का बाप इस बात को लेकर फिक्रमंद रहता है कि उसकी बेटी की शादी की व्यवस्था कैसे होगी। समाज में व्याप्त इसी सोच के चलते कन्या भ्रूण हत्या पर रोक नहीं लग पायी है। कोख में कन्याओं को मार देने के कारण समाज में लिंगानुपात की समस्या बढ़ गयी है।

कन्या भ्रूण हत्या में ज्यादा चिंता का विषय है, इसमें मां का भागीदार होना। एक मां जो खुद पहले स्त्री होती है, वह कैसे अपने ही अस्तित्व को नष्ट कर सकती है? यह भी तब जब वह जानती हो कि वह लड़की भी उसी का अंश है।

औरत ही औरत के ऊपर होने वाले अत्याचार की जड़ होती है, यह कथन पूरी तरह से गलत भी नहीं है। घर में सास द्वारा बहू पर अत्याचार, गर्भ में मां द्वारा बेटी की हत्या और ऐसे ही कई कारण हैं जिससे महिलाओं की स्थिति ही शक के घेरे में आ जाती है।

बहुत से लोग शिक्षित होने के बावजूद समाज के कन्या भ्रूण हत्या जैसे घृणित कार्य को अंजाम दे रहे हैं। जिस देश में स्त्री के त्याग और ममता की दुहाई दी जाती हो, उसी देश में कन्या के आगमन पर पूरे परिवार में मायूसी और शोक छा जाना समझ से परे है।

आज भी पुरानी सोच वाले लोग बेटियों की बजाय बेटों को ही ज्यादा तव्वजो देते हैं। बालक-बालिका दोनों प्यार के बराबर अधिकारी हैं। इनके साथ किसी भी तरह का भेद करना ठीक नहीं है।

भारत में पुरुषों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। सरकार की लाख कड़ाई के बावजूद भारत में हर साल लगभग तीन से सात लाख कन्या भ्रूण नष्ट कर दिये जाते हैं। इसलिए यहां महिलाओं से पुरुषों की संख्या 5 करोड़ ज्यादा है।

सोनोग्राफी के प्रचलन से लड़के की चाह रखनेवाले लोगों को वरदान मिल गया और कन्या भ्रूण की पहचान कर हत्या की शुरुआत हुई। इस प्रकार से पहचान कर कन्या भ्रूण की हत्या के कारण भारत में पुरुषों की संख्या में तेजी से उछाल आया।

समाज में निरंतर परिवर्तन और कार्य बल में महिलाओं की बढ़ती भूमिका के बावजूद रुढ़िवादी विचारधारा के लोग मानते हैं कि बेटा बुढ़ापे का सहारा होगा और बेटी हुई, तो वह अपने घर चली जाएगी।

बेटा अगर मुखाग्नि नहीं देगा, तो कर्मकांड पूरा नहीं होगा। भारत में 1994 में महिला भ्रूण की पहचान करनेवाले मेडिकल पेशेवरों के विरुद्ध कानून बना, लेकिन आज भी चोरी-छिपे अवैध ऑपरेटर यह काम कर रहे हैं।

पिछले 50 सालों में बाल लिंगानुपात में 63 प्वाइंट की गिरावट दर्ज की गयी है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लिंगानुपात को बढ़ाने के लिए अनेकानेक प्रयास किये गये हैं लेकिन स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ती ही गयी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी इस दिशा में लगातार चिंता जतायी जाती रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट जैसी सर्च इंजन कम्पनियों को भ्रूण लिंग जांच से जुड़े विज्ञापन और कंटेंट दिखाने पर फटकार लगाई। कोर्ट ने इन कम्पनियों को एक विशेषज्ञ समिति बनाने के निर्देश दिया है जो भ्रूण लिंग जांच से जुड़े आपत्तिजनक शब्द पहचानकर उससे जुड़े कंटेंट ब्लॉक करेंगी।

हाल ही में सम्पन्न हुए राष्ट्रमंडल व एशियाई खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ियों ने जो प्रदर्शन किया वो काबिले तारीफ था। हमारे देश के पुरूष खिलाड़ियों के बराबर पदक जीत कर महिला खिलाड़ियों ने दिखा दिया कि यदि उनको भी बराबरी का दर्जा व सुविधा मिले तो किसी भी क्षेत्र में वे पुरूषों से कम नहीं हैं। आज देश के हर क्षेत्र में महिलायें पुरूषों के साथ कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। अब तो महिलायें सेना में जंगी जहाज भी उड़ाने लगी हैं।

चिंताजनक यह कि सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद समाज में कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। समाज में लड़कियों की इतनी अवहेलना, इतना तिरस्कार चिंताजनक और अमानवीय है। सरकार ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम की पहल की है। इस कार्यक्रम को एक राष्ट्रव्यापी जन अभियान बनाना होगा।

भारत में लगातार घटते जा रहे इस बाल लिंगानुपात के कारण को गंभीरता से देखने और समझने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान के झुंझुनू में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान का शुभारम्भ करते वक्त कन्या भ्रूण हत्या जैसे घृणित कार्य को समाज पर कलंक बताया था। उन्होंने कहा था कि सरकार हर सम्भव कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाएगी।

जाहिर है लिंगानुपात कम होने का कारण प्राकृतिक नहीं है। यह एक मानव निर्मित समस्या है, जो कमोबेश देश के सभी हिस्सों, जातियों, वर्गों और समुदायों में व्याप्त है। भारतीय समाज में व्याप्त लड़कियों के प्रति नजरिया, पितृसत्तात्मक सोच, सामाजिक-आर्थिक दबाव, असुरक्षा, आधुनिक तकनीक का गलत इस्तेमाल इस समस्या के प्रमुख कारण हैं।

अब समय आ गया है कि समाज के पढ़े-लिखे लोगों को आगे आकर कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनौने कार्य को रोकने का माहौल बनाना होगा। ऐसा करने वाले लोगों को समझा कर उनकी सोच में बदलाव लाना होगा।

आज लड़कियां लड़कों से किसी भी क्षेत्र में कमतर नहीं हैं। दुश्कर से दुश्कर कार्य लड़कियां सफलतापूर्वक कर रही हैं। देश में हर क्षेत्र में महिला शक्ति को पूरी हिम्मत से काम करते देखा जा सकता है। इस नवरात्रि पर लोगों को इस बात का संकल्प लेना होगा कि न तो गर्भ में कन्या की हत्या करेंगे न ही किसी को करने देंगे, तभी देश में कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लग पाना संभव हो पाएगा।

Source:- https://insightonlinenews.in

Tuesday, April 2, 2019

भोजन और सेहत दोनों के लिए उपयोगी है हींग


भारतीय रसोई में हींग की अपनी खास जगह है। व्यंजनों में खासतौर पर खुशबू और स्वाद के लिए किया जाता है। हींग के कई फायदे हैं, जो हमारे स्वास्थ्य में लाभदायक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
दाल, सब्जी और सांभर में हींग का तड़का लग जाए तो स्वाद लाजवाब हो जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में पैदा होने वाला हींग हमारे देश में कम मात्रा में ही पाया जाता है। इसकी तासीर गर्म होती है जिसकी वजह से यह काफी फायदेमंद होता है। इसके औषधीय गुण कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से हमारे शरीर की रक्षा करते हैं।
आमतौर पर ये गहरे लाल या फिर भूरे रंग की होती है। पेट में दर्द होने पर आप हींग को पानी में घोलकर पेट की नाभि के आस पास लगा सकते हैं इससे आप के दर्द में राहत प्राप्त होगी। भारत में यह कश्मीर और पंजाब सहित अमृतसर के कुछ हिस्सों में पैदा होता है। हींग एक बारहमासी शाक है।
हींग फेरूला-फोइटिडा नाम के पौधे का रस है। इस पौधे के रस को सुखा कर हींग बनाई जाती है। इसके पौधे 2 से 4 फीट तक ऊंचे होते हैं।ये पौधे विशेष रूप से ईरान, अफगानिस्तान, तुर्केमिस्तान, बलूचिस्तान, काबुल औैर खुरासान के पहाड़ी क्षेत्रों में होते हैं।


पेट की तकलीफ को दूर करने के लिए हींग बहुत फायदेमंद होता है। गुनगुने पानी में चुटकी भर हींग मिलाकर पीने से पेट की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। हींग के पानी में मौजूद एंटी बैक्टीरियल गुण अस्थमा के रोग में काफी फायदेमंद होते हैं।
रोजाना हींग का पानी पीने से हड्डियां मजबूत होती हैं। इसमें एंटी आॅक्सीडेंट्स गुण पाए जाते हैं। जो शरीर में खून की कमी होने से बचाते हैं। साथ ही हमारे दांतों को भी मजबूत बनाता है। यह डायबिटीज के मरीजों के भी फायदेमंद माना जाता है क्योंकि इसके पीने से ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है।

2. अपच हो जाने पर : अपच हो जाने की स्थिति में हींग का सेवन करना बहुत फायदेमंद रहता है। गैस की समस्या से छुटकारा पाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। अगर आपको बदहजमी की शिकायत है तो आप एक कप पानी में हींग की कुछ मात्रा मिलाकर उसका सेवन करें। इससे लाभ होगा ।
3. सांस संबंधी समस्याओं में : हींग का इस्तेमाल श्वसन नाल से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। अगर आपको बलगम या फिर छाती में दर्द की शिकायत है तो आप इसका उपचार अपना सकते हैं।
4.दर्द निवारक के तौर पर : हींग का इस्तेमाल कई तरह के दर्द दूर करने के लिए किया जाता है। पेट दर्द और सिर दर्द में इसे हल्का गर्म करके लेप करने से लाभ होता है और अगर आपके दांतों में दर्द है तो आप इसे नींबू की कुछ बूंदों के साथ मिलकार प्रभावित दांत पर लगा सकते हैं। ऐसा करने से फायदा होता है।
हींग का सेवन पुरुषों की तमाम यौन संबंधी रोगों के उपचार में भी लाभकारी है। हर रोज खाने में थोड़ा सा हींग मिलाकर सेवन करने से नपुंसकता में कमी की समस्या से छुटकारा मिल सकता है।
महर्षि चरक के अनुसार, हींग दमा के रोगियों के लिए रामबाण औषधि है। यह कफ का नाश करने वाली, गैस की समस्या से राहत देने वाली, लकवा के रोगियों के लिए फायदेमंद व आंखों के लिए भी बेहद लाभदायक होती है।
हींग का इस्तेमाल हींग-जीरा आलू, बेसनी सेव, मिर्च का आचार, जीरा, मसाला मिक्स पराठा, सूजी के गोलगप्पे, हींग का अचार, पनीर सैंडविच, गट्टा पुलाव, गोभी भुर्जी, दही भल्ले, चावल के फरे, चावल-लौकी के मुठीया, कोफ्ता पालक ग्रेवी, कोफ्ता करी, खारेक मुखवास,पालक गुटके, वेजीटेवल उपमा, ओट्स चीला, चावल की चकली,पौष्टिक बाजरे का चीला, बीटरूट शमी कबाब, पापड़ मेथी की सब्जी सहित कई पकवानों में किया जाता है। हींग में पाए जाने वाले औषधीय गुण, सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद होते हैं और स्वास्थ्य समस्याओं से हमारे शरीर की रक्षा करते हैं।

Wednesday, February 27, 2019

Google rolls outs AI grammar checker for G Suite users

US Internet giant Google has said its artificial intelligence (AI)-based grammar checker, corporate web tools and services are available for all users of G Suite, to help them improve writing.

Unlike standard spellcheck in Google Docs, Google applies Machine Learning technology to grammar checker as one of the AI tools that can let software understand complex grammar rules and identify any “tricky” grammatical errors by users in writing, Xinhua news agency reported.
“Using machine translation, we are able to recognize errors and suggest corrections as work is getting done,” G Suite product manager Vishnu Sivaji said in a statement on Tuesday.
He said that G Suite customers will see inline, contextual grammar suggestions in their documents as they type, just like spellcheck.
“If you’ve made a grammar mistake, a squiggly blue line will appear under the phrase as you write it,” Sivaji added.
He said Google has been working closely with language experts to decipher the rules for the machine translation model and used them as the foundation of automatic suggestions in Google Docs, which was all powered by AI.
Google grammar checker will be an extra tool for users to improve their writing alongside spellcheck, which was first introduced in Google Docs seven years ago.

Source:- https://insightonlinenews.in

Monday, February 25, 2019

The Oscar for Best Foreign Film should go to ‘Shoplifters’, not ‘Roma’

There’s no mistaking the fact that Alfonso Cuaron’s Mexican film “Roma” and Hirokazu Kore-eda’s Japanese “Shoplifters” are both great films. And they deserve to win the Oscar on Sunday for Best Foreign Film.

Both speak a universal language of the heart. They are both works that celebrate the joy of being part of a family and, in fact, they tell us that a family is not what you are born with but what you cultivate and nurture. In “Roma” the househelp Cleo (Yalitza Aparicio) in an upper-class Mexican household is more “family” to her employers than family can ever be.
Director Cuaron follows the ups and downs in the fortunes of Cleo’s employers’ lives, neither judging them for their shortcomings nor congratulating them for their triumphs. “Roma” simply moves on in susurrating rhythms that not only echo life, they also burnish those rhythms with intimations of eternity.



Such is the magic of great cinema. We get swept into drama effortlessly in both “Roma” and “Shoplifters” without understanding the spoken language. I firmly believe that in Great Cinema the language should be the least relevant component of communication.

In “Shoplifters”, signs, signals and echoes play a very important role in the overall impact that the film makes. Twenty-four hours after I saw this masterpiece, I am still thinking about the characters — those fringe people living at the edge of society in Tokyo, no different from Satyajit Ray’s famine-stricken bravehearts of Bengal in “Pather Panchali”.

There is a major difference between “Pather Panchali” and “Shoplifters”. In Ray’s film there is hardly any food. In “Shoplifters”, the family is constantly eating the fancy food that they steal from stores and devour as their own.

It’s an immoral way of life. But one that gives space above the stomach and below the brain for love and compassion. What really won me over in “Shoplifters” was the Shibata family’s celebration of its dysfunctional status without diminishing its tragic context of deprivation and poverty.

The Japanese family is ‘happy’ in a way that happiness can be obtained when one accepts doom as the ultimate culmination of the family journey into the vast open inviting spaces of the city, which becomes a space for a daring adventure for the family’s son and daughter.
The son, Shota, and the illegally adopted daughter, “Yuri”, in “Shoplifters” reminded me of Apu and Durga in “Pather Panchali”. The same innocence swathed in a wisdom that comes easily to those who learn about survival from the hard licks of life at a very young age.
As in “Pather Panchali”, there are no villains in “Shoplifters”, not even destiny, whose cruel verdicts seem to punch a hole in the family’s shared joy much too soon.

Unlike “Roma” where the director elects to leave the family with a non-tragic finale, the family in “Shoplifters” falls apart at the end. There is an unforgettable father-son sequence at the finale where the son asks his father some harsh questions about the parental bond. In an earlier scene on the beach (both “Roma” and “Shoplifters” have a crucial family-on-the-beach interlude), the father speaks to his son about puberty, breasts and arousal like an older buddy.

Apu, in “Pather Panchali” could have never shared these confidences with his father. In India, we are much too in awe of our parents to discuss bodily pleasures with them. Besides, Satyajit Ray was shy of physical intimacy and sex. “Shoplifters” holds nothing sacred and, therefore, hides nothing from its characters’ area of rumination. You can’t afford to be coy when you sleep in a kerchief-sized room with five other members of your family.

In “Roma” the family shares a lot of silences. In “Shoplifters”, they are constantly conversing and, of course, eating. Did your parents teach you it’s ill-mannered to talk while eating? Watch the family in “Shoplifters” talk while they eat, run, steal, sleep…They break many rules and they do it without a show of even an iota of bravado. These people need to bond constantly because time is running out on them. And they don’t need silences to remind them of their brittle lives.

I would go with the Oscar for “Shoplifters”. This family needs the endorsement much more than the family in “Roma”.